Results for राजस्थान का इतिहास

भरतपुर का जाट वंश

September 26, 2018
भरतपुर के जाट वंश का इतिहास
👉भरतपुर का जाट वंश-
➯राजस्थान के पूर्वी भाग भरतपुर, धौलपुरस डींग आदि क्षेत्रों पर जाट वंश का शासन था।
➯राम के भाई भरत के नाम पर ही इस राजवंश का नाम भरतपुर राजवंश पड़ा है।

👉गोकुल जाट-
➯1669 ई. में मथुरा क्षेत्र के जाटों द्वारा स्थानीय जमीदार गोकुल जाट के नेतृत्व में औरंगजेब के खिलाफ पहला संगठित विद्रोह किया गया था।
➯औरंगजेब के खिलाफ यह पहला हिन्दु विद्रोह था।
➯10 मई 1666 को गोकुल जाट (जाटों) व औरंगजेब की सेना में तिलपत का युद्ध हुआ था।
➯तिलपत के युद्ध में मुगल फौजदार हसन अली खां ने गोकुल जाट को पराजित कर मार डाला था।

👉राजाराम जाट-
➯गोकुल जाट के बाद राजाराम जाट ने जाट विद्रोह का नेतृत्व किया।
➯1685 ई. में राजाराम के नेतृत्व में दूसरा जाट विद्रोह हुआ था।
➯सिकन्दरा (आगरा) में स्थित अकबर के मकबरे को लूटा तथा मकबरे में अकबर की हड्डियों को निकाल कर हिन्दु विधियों से जला दिया था।
➯1688 ई. में औरंगजेब के पौत्र तथा आमेर के शासक बिसन सिंह ने राजाराम को पराजित किया।

👉चूडामन जाट-
➯1688 ई. में राजाराम की मृत्यु के बाद उनके भतीजे चूडामन या चूड़ामन ने जाट नेतृत्व की बागडोर संभाली।
➯चूडामन जाट ने थून में किला बनाकर अपना राज्य स्थापित किया।

👉बदन सिंह जाट-
➯बदन सिंह जाट ने आगरा व मथुरा पर अधिकार करके भरतपुर के नये राजघराने की नींव डाली।
➯बदनसिंह जाट ने डीग, कुम्हेर, बैर व भरतपुर में नये दुर्ग बनवाये।
➯बदनसिंह जाट के पुत्र सूरजमल जाट ने सोधर के निकट दुर्ग का निर्माण करवाया जो भरतपुर या लोहगढ़ या अजयगढ़ दुर्ग के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
➯बदनसिंह जाट ने भरतपुर को अपनी राजधानी बनाया।
➯वृंदावन में एक मंदिर बनवाया तथा डीग के किले में कुछ महलों का निर्माण करवाया।
➯बदनसिंह जाट को जयपुर नरेश सवाई जयसिंह ने ब्रजराज की उपाधि प्रदान कर डीग परगने की जागीर दी।

👉महाराजा सूरजमल जाट (1756-1763 ई.)-
➯महाराजा सूरजमल जाट के राज्य में आगरा, मथुरा, मेरठ, अलीगढ़ आदि सम्मिलित थे।
➯अपनी बुद्धिमता व राजनीतिक कुशलता के कारण महाराजा सूरजमल जाट को जाट जाति का प्लेटो कहा जाता है।
➯महाराजा सूरजमल जाट ने 1754 ई. में मराठा नेता होल्कर के कुम्हेर आक्रमण को विफल किया।
➯महाराजा सूरजमल जाट ने 12 जून 1761 को आगरा के किले पर अधिकार किया।
➯महाराजा सूरजमल जाट ने डीग के जलमहलों का निर्माण करवाया।
➯जलमहलों में गोपाल भवन, नंद भवन, केशव भवन, सावन भादौ भवन आदि प्रसिद्ध थे।
➯1763 ई. में नजीब खाँ रोहिला के साथ युद्ध करते हुए महाराजा सूरजमल जाट की मृत्यु हो गई।
➯महाराजा सूरजमल जाट की पत्नी किशोरी देवी अपनी बुद्धिमता के लिए प्रसिद्ध थी।

👉जवाहर सिंह-
➯महाराजा सूरजमल के बाद उसका पुत्र जवाहर सिंह भरतपुर का शासक बना था।
➯जवाहर सिंह ने दिल्ली पर आक्रमण किया तथा विजय के उपलक्ष में जवाहर सिंह जाट ने दिल्ली के लाल किले के दरवाजे को भरतपुर के किले में लगवाया था।

👉रणजीत सिंह-
➯29 सितम्बर 1803 ई. में अंग्रेजी सरकार के प्रतिनिधि लाॅर्ड लेक डाउन वेल ने रणजीत सिंह के साथ संधि की।

👉बृजेन्द्र सिंह-
➯आजादी के समय भरतपुर का शासक बृजेन्द्र सिंह जाट था।
➯स्वतंत्रता के बाद भरतपुर मत्स्य संघ में विलय हुआ


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भरतपुर का जाट वंश भरतपुर का जाट वंश Reviewed by asdfasdf on September 26, 2018 Rating: 5

राजस्थान में जनजातीय आंदोलन

September 16, 2018
राजस्थान में जनजाति आंदोलन
👉जनजातीय आंदोलन का उद्देश्य-
➯राजस्थान में जनजातीय आंदोलन का मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को सामाजिक रूप से उन्नत करना था।

👉दयानंद सरस्वती-
➯राजस्थान में सामाजिक सुधार आंदोलनों का जनक दयानंद सरस्वती को माना जाता है।
➯दयानंद सरस्वती नें सन् 1883 में परोपकारिणी सभा नामक संगठन बनाया।

1. भगत आंदोलन-
➯राजस्थान में जनजातियों के प्रभाव क्षेत्र दक्षिणी राजस्थान में आदिवासियों के सामाजिक सुधार के लिए सुरजी भगत ने आंदोलन प्रारम्भ किया जिसे भगत आंदोलन कहा जाता है।
➯भगत आंदोलन का वास्तविक जनक गोविंद गिरी था।
➯गोविंद गिरी दयानंद सरस्वती का आदिवासी शिष्य था।
➯भगत आंदोलन का नेतृत्व गोविंद गिरी ने किया था।
➯गोविंद गिरी का जन्म सन् 1858 में राजस्थान के डुंगरपुर जिले के बांसिया गांव में एक बंजारे के घर में हुआ था।
➯गोविंद गिरी ने दयानंद सरस्वती से आशीर्वाद लेकर दक्षिणी जनजातीय क्षेत्र में भगत आंदोलन को नई दिशा दी।
➯भगत आंदोलन को नई दिशा देने के लिए गोविंद गिरी ने सन् 1883 में राजस्थान के सिरोही जिले में सम्प सभा की स्थापना की।
➯भगत आंदोलन का वास्तविक जनक गोविंद गिरी को कहते है।
➯गोविंद गिरी को सामाजिक सुधार आंदोलन का नेतृत्व करने के कारण गुरू कहा जाने लगा था।
➯गुरू गोविंद गिरी ने भगत आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में मानगढ़ पहाड़ी पर कार्यस्थल या कार्यक्षेत्र बनाया था।
➯सम्प सभा का प्रथम वार्षिक अधिवेशन 7 दिसम्बर, 1908 को बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर आयोजित किया गया था।
➯सम्प सभा का दूसरा वार्षिक अधिवेशन 7 दिसम्बर 1913 को बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर आयोजित किया गया था।
➯सम्प सभा के दूसरे वार्षिक अधिवेशन में कर्नल शैटर्न के नेतृत्व में मेवाड़ भील कौर के सैनिकों ने गोलीबारी की जिसमें लगभग 1500 भील मारे गए तथा गुरू गोविंद गिरी को गिरफ्तार कर लिया गया था।
➯मानगढ़ पहाड़ी कि इस गोलिबारी घटना को मानगढ़ हत्याकांड कहते है।
➯गुरू गोविंद गिरी ने अपना अंतिम समय कम्बोई (गुजरात) में व्यतित किया था।
➯गुरू गोविंद गिरी का समाधि स्थल राजस्थान के बांसवाड़ा जिले की मानगढ़ पहाड़ी पर बना हुआ है।
➯राजस्थान सरकार का पर्यटन विभाग गुरू गोविंद गिरी समाधि स्थल को मानगढ़ धाम नाम से पर्यटन के लिए विकसित कर रहा है।
➯भगत आंदोलन का उद्देश्य भीलों को मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना तथा भील समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करना था।
➯गुरू गोविंद गिरी का गीत "भूरटिया नी मानू रे नी मानू" आज भी भील क्षेत्र में प्रचलित है।

2. एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन (1921)-
➯एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन का नेतृत्व मोतीलाल तेजावत द्वारा किया गया था।
➯एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन का उद्देश्य भीलों में एकता स्थापित करना था।
➯एकी आंदोलन या भोमट भील आंदोलन की शुरुआत राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जले के मातृकुंडिया धाम में हुई थी।
➯एकी आंदोलन का कार्यस्थल चित्तौड़गढ़ जिले के मातृकुंडिया धाम को बनाया गया था।
➯एकी आंदोलन के तहत पहली आम सभा झाड़ोल (उदयपुर) में हुई थी।
➯एकी आंदोलन का प्रभाव क्षेत्र भोमट का पठारी भाग था इसी कारण एकी आंदोलन को भोमट आंदोलन भी कहा जाता है।
➯भीलों ने मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में 7 मार्च, 1922 को राजस्थान के अजमेर जिले के नीमड़ा गांव में भील सभा का आयोजन किया था।
➯7 मार्च, 1922 की नीमड़ा गांव की भील सभा पर मेवाड़ भील कौर के सैनिकों ने गोलीबारी की जिसमें लगभग 1200 भील मारे गए तथा इस गोलीबारी कांड को नीमड़ा हत्याकांड कहते है।
➯सन् 1929 में गांधी जी के कहने पर मोतीलाल तेजावत ने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया तथा सन् 1945 तक जेल में रहे थे।
➯मोतीलाल तेजावत को आदिवासियों का मसीहा तथा भीलों का संत मावजी कहते है।
➯राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित मातृकुंडिया धाम को राजस्थान तथा मेवाड़ा का हरिद्वार कहते है।

3. मीणा आंदोलन या मीणा जनजाति आंदोलन-
➯मीणा आंदोलन जयपुर के आसपास रहने वाले मीणा जनजाति के द्वारा चलाया गया आंदोलन था।
➯मीणा जनजाति के दो भाग माने जाते है-
1. जमीदार मीणा
2. चौकीदार मीणा
➯सन् 1924 में ब्रिटिश सरकार ने क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट/अधिनियम/ कानून पारित किया।
➯क्रिमिनल ट्राइब्स अधिनियम के अन्तर्गत सन् 1930 में जयपुर राज्य जयराम पेशा कानून बनाया गया था।
➯जयराम पेशा कानून के अन्तर्गत 12 वर्ष से अधिक आयु के सभी मीणा युवकों को यह आदेश दिया गया की उन्हें प्रतिदिन थाने में उपस्थिति दर्ज करानी होगी।
➯जयराम पेशा कनून को समाप्त करने के लिए 1933 में मीणा क्षेत्रीय महासभा की स्थापना की गई।
➯सन् 1944 में नीम का थाना (सीकर) में मीणाओं की महासभा हुई इस सभा की अध्यक्षता जैन मुनि मगन सागर ने की थी।
➯इस सभा के दौरान सन् 1944 में मीणा समाज में जागृति के लिए मीणा राज्य सुधार समिति का गठन किया गया था।
➯मीणा राज्य सुधार समिति का अध्यक्ष पंडित बंशीधर शर्मा को बनाया गया था।
➯चौकीदार मीणाओं को एक टैक्स या हर्जाना देना पड़ता था चाहे चोरी कोई भी करे हर्जाना चौकीदार मीणाओं को ही देना पड़ता था इसी को दादरसी कानून कहा जाता था।
➯सन् 1945 में मीणाओं का राज्यव्यापी आंदोलन चला।
➯28 अक्टूबर 1946 को मीणाओं ने मुक्ति दिवस के रूप में मनाया था।
➯सन् 1952 में क्रिमिनल ट्राइब्स तथा जयराम पेशा कानून रद्द कर दिये गये और मीणाओं को अपने मूलभूत अधिकारों की प्राप्ति हुई।



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राजस्थान में जनजातीय आंदोलन राजस्थान में जनजातीय आंदोलन Reviewed by asdfasdf on September 16, 2018 Rating: 5

राजस्थान एकीकरण के चरण

June 22, 2018
👉 राजस्थान एकीकरण के सात चरण-
✍ राजस्थान का एकीकरण कुल 7 चरणो मे पुरा हुआ।




1. पहला चरण- 18 मार्च 1948 को
✍ नाम- मत्स्य संघ
✍ शामिल रियासत- अलवर, भरतपुर, करौली, धौलपुर
✍ ठिकाना- निमराणा (अलवर)
✍ राजधानी- अलवर
✍ उद्घाटन- भरतपुर के लौहागढ़ दुर्ग मे
✍ उद्घाटन कर्ता- N.V. गोडगिल/गोडविल (नरहरी विष्णु गोडगिल)
✍ राज प्रमुख- धौलपुर नरेश उदयभान सिंह
✍ उपराज प्रमुख- करौली के महारावल गणेशपाल
✍ प्रधानमंत्री- शोभाराम कुमावत (अलवर)
✍ उप प्रधानमंत्री- युगल किशोर चतुर्वेदी (राजस्थान का नेहरू)
✍ मत्स्य संघ नाम देने वाला- K.M. मुंशी (कन्हैया लाल माणिक्य लाल मुंशी

2. दुसरा चरण- 25 मार्च 1948
✍ नाम- पूर्व राजस्थान
✍ शामिल रियासत- कोटा, झालावाड़, बूंदी, टोंक, किशनगढ़, शाहपुरा, बासवाड़ा, डूँगरपुर, प्रतापगढ़
✍ ठिकाना- लावा (जयपुर), कुशलगढ़
✍ राजधानी- कोटा
✍ उद्घाटन कर्ता- N.V. गोडगिल (यह प्रथम आंगल भारतीय था)
✍ राज प्रमुख- भीमसिंह (कोटा)
✍ उपराज प्रमुख- बूंदी नरेश बहादुर सिंह
✍ प्रधानमंत्री- गोकुल लाल असवा (शाहपुरा)

3. तीसरा चरण- 18 अप्रेल 1948
✍ नाम- संयुक्त राजस्थान
✍ शामिल रियासत- पूर्व राजस्थान व उदयपुर
✍ राजधानी- उदयपुर (मेवाड़)
✍ उद्घाटन कर्ता- भीमसिंह
✍ राज प्रमुख- भूपाल सिंह
✍ उपराज प्रमुख- भीमसिंह (कोटा)
✍ प्रधानमंत्री- माणिक्य लाल वर्मा

4. चौथा चरण- 30 मार्च 1949
✍ नाम- वृहद राजस्थान
✍ शामिल रियासत- संयुक्त राजस्थान, जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर, बीकानेर
✍ राजधानी- जयपुर
✍ उद्घाटन कर्ता- सरदार वल्लभ भाई पटेल
✍ राज प्रमुख- सवाई मानसिंह द्वितिय (जयपुर)
✍ प्रधानमंत्री- हिरा लाल शास्त्री
✍ 30 मार्च को ही राजस्थान दिवस मनाया जाता है इसी चरण मे जीवन पर्यन्त महाराज प्रमुख भूपाल सिंह को बनाया गया व राजस्थान के प्रथम मनोनित मुख्यमंत्री हिरा लाल शास्त्री को बनाया गया।
✍ सत्य नारायण समिति कि सिफारिस पर भोगोलिक एंव पेयजल कि दृष्टि से जयपुर को राजधानी बनाने कि सिफारिस  कि गयी।
✍ सत्य नारायण समिति कि अन्य सिफारिस उच्च न्यायालय (जोधपुर), कृषि विभाग (भरतपुर), खनिज विभाग (उदयपुर), शिक्षा विभाग (बीकानेर), वन विभाग (कोटा) को बनाया।

5. पाँचवा चरण- 15 मई 1949
✍ नाम- संयुक्त वृहद राजस्थान
✍ शामिल रियासत- वृहद राजस्थान व मत्स्य संघ
✍ राजधानी- जयपुर
✍ उद्घाटन कर्ता- सरदार पटेल
✍ राज प्रमुख- सवाई मानसिंह द्वितिय
✍ प्रधानमंत्री- हिरा लाल शास्त्री
✍ शंकर राय देव समिति कि सिफारिस पर वृहद राजस्थान को पाँचवे चरण मे शामिल किया गया।

6. छठा चरण- 26 जनवरी 1950
✍ नाम- राजस्थान संघ
✍ शामिल रियासत- संयुक्त वृहद राजस्थान व सिरोही (आबू तथा देलवाड़ा को छोड़कर)
✍ आबू व देलवाड़ा को गोकुल भाई भट्ट के प्रयासो से राजस्थान मे मिलाया गया।
✍ गोकुल भाई भट्ट को राजस्थान का गाँधी कहा जाता है।

7. सातवा चरण- 1 नवम्बर 1956
✍ नाम- राजस्थान
✍ शामिल रियासत- राजस्थान संघ, आबू, देलवाड़ा, सुमेल टप्पा व अजमेर
✍ सुमेल टप्पा मध्यप्रदेश के मंदसोर जिले कि भानुपुरा तहसिल से लेकर झालावाड़ मिलाया गया।
✍ कोटा के सिरोज उपखण्ड को मध्यप्रदेश मे मिलाया गया।
✍ राजस्थान को A श्रेणी का दर्जा दिया गया व राज्यपाल कि नियुक्ति जारी कि गई और प्रथम राज्यपाल गुरुमुख निहाल सिंह बने।

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राजस्थान एकीकरण के चरण राजस्थान एकीकरण के चरण Reviewed by asdfasdf on June 22, 2018 Rating: 5

बीकानेर का राठौड़ वंश

May 27, 2018
👉 बीकानेर का राठौड़ वंश-
✍ संस्थापक- राव बीका
✍ राव बीका और एक जाट नेता नेर/नर के द्वारा बीकानेर के राठौड़ वंश की नींव रखी गई।
✍ राजस्थान का पहला राठौड़ वंश मारवाड़ था।
✍ राजस्थान का दुसरा राठौड़ वंश बीकानेर था।
✍ राजस्थान का तीसरा राठौड़ वंश किशनगढ़ था।



1. राव बीका-
✍ शासन काल- 1465-1504 ई.
✍ राव बीका राव जोधा के पाँचवे पुत्र थे।
✍ राव बीका ने बीकानेर में राठौड़ वंश की नींव करणीमाता के अाशीर्वाद से 1465 ई. में रखी थी।
✍ राव बीका ने 1468 ई. में बीकानेर बसाया तथा बीकानेर को ही अपनी राजधानी बनाया था।

2. राव लूणकरण-
✍ शासन काल- 1505- 1526 ई.
✍ बीठू सूजा ने अपने ग्रंथ "जैतसी रो छंद" में राव लूणकरण को कलियुग का कर्ण कहा है।
✍ 1526 ई. में नारनौल के नवाब के साथ युद्ध करते समय 1526 ई. में राव लूणकरण का निधन हो गया था।

3. राव जैतसी-
✍ शासन काल- 1526-1541 ई.
✍ बीठू सूजा ने अपना ग्रंथ "जैतसी रो छंद" राव जैतसी के काल में लिखा था।
✍ 17 मार्च 1527 को खानवा के युद्ध में राव जैतसी ने अपने पुत्र कल्याणमल को भेजा।
✍ 26 अक्टूबर 1534 को राव जैतसी ने बाबर के पुत्र कामरान पर आक्रमण कर बीकानेर छीन लिया।

👉 पाहेबा/साहेबा का युद्ध-
✍ समय- 1541 ई.
✍ स्थान- पाहेबा (श्री गंगानगर)
✍ मध्य- बीकानरे शासक राव जैतसी तथा मारवाड़ शासक मालदेव
✍ जीत- मालदेव
✍ 26 फरवरी 1542 को मालदेव से युद्ध करते हुए राव जैतसी वीर गति को प्राप्त हुआ।

4. राव कल्याणमल-
✍ शासन काल- 1544-1574 ई.
✍ गिरि सुमेल के युद्ध में शेरशाह सूरी की सहायता राव कल्याणमल द्वारा कि गई।
✍ राव कल्याणमल शेरशाह सूरी के सहयोग से बीकानेर के शासक बने।
✍ 1570 ई. के नागौर दरबार में राव कल्याणमल अपने दोनों पुत्रों (रायसिंह व पृथ्वीराज राठौड़) के साथ उपस्थित हुए।
✍ अकबर की अधीनता स्वीकार करने वाला बीकानेर का प्रथम शासक राव कल्याणमल था। जिसने 1570 ई. में नागौर दरबार में अधीनता स्वीकार की थी।

👉 पृथ्वीराज राठौड़-
✍ पृथ्वीराज राठौड़ राव कल्याणमल का छोटा पुत्र था।
✍ पृथ्वीराज राठौड़ अकबर के नवरत्नों में शामिल था।
✍ पृथ्वीराज राठौड़ ने 1580 ई. में डिंगल भाषा में "बेलि किसन रुक्मणी री" नामक ग्रंथ लिखा।
✍ कवि दुरसा आढ़ा ने "बेलि किसन रुक्मणी री" ग्रंथ को पाँचवाँ वेद तथा 19वाँ पुराण कहा है।

5. महाराजा रायसिंह-
✍ शासन काल- 1574-1612 ई.
✍ रायसिंह दो मुगल बादशाहों अकबर तथा जहाँगीर की सेवा में रहे।
✍ हिंदु राजाओं में जयपुर के बाद बीकानेर के रायसिंह का प्रभाव मुगल दरबार में रहा।
✍ मुगल दरबार में मानसिंह के बाद सर्वाधिक प्रभाव रायसिंह का था।
✍ जहाँगीर पर सर्वाधिक प्रभाव राजपूत राजा रायसिंह का था।
✍ 1572 ई. में अकबर ने रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया।
✍ रायसिंह ने 1574 ई. में चन्द्रसेन से सिवाणा का दुर्ग प्राप्त करने हेतु आक्रमण किया परन्तु असफल रहा।
✍ जहाँगीर ने रायसिंह को 5000 का मनसबदार बनाया।
✍ खुसरो के विद्रोह के समय आगरा कि रक्षा का दायित्व रायसिंह को सौंपा गया।
✍ रायसिंह ने बीकानेर में अपने मंत्री क्रमचन्द कि देख-रेख में 1589-1594 ई. में जुनागढ़ दुर्ग का निर्माण करवाया व रायसिंह प्रशस्ति उत्कीर्ण करवायी।
✍ मुनसी देवी प्रसाद ने रायसिंह को राजपूताना का कर्ण कहा है।
✍ रायसिंह प्रशस्ति का लेखक जैइता नामक जैन मुनी था।
✍ रायसिंह प्रशस्ति संस्कृत भाषा में लिखी गयी है।

6. महाराजा दलपत सिंह-
✍ शासन काल- 1612-1613 ई

7. महाराजा सूरसिंह-
✍ शासन काल- 1613-1631 ई.

8. महाराजा कर्णसिंह-
✍ शासन काल- 1631-1669 ई.
✍ कर्णसिंह ने देशनोक (बीकानेर) में करणीमाता के वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया।
✍ कर्णसिंह को जांगलधर बादशाह की उपाधि दी गई थी। जो की औरंगजेब द्वारा दी गई थी।

9. महाराजा अनूपसिंह-
✍ शासन काल- 1669-1698 ई.
✍ मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा अनूपसिंह को महाराजा व  माही मरातिब कि उपाधि प्रदान की गई।
✍ अनूपसिंह के दरबारी कवि भावभट्ट ने अनूपसिंह संगीत विलास, अनूप संगीत रत्नाकर व अनूपाकुश नामक ग्रंथ कि रचना की।
✍ अनूपसिंह ने संस्कृत भाषा में  अनूपसिंह विवेक, अनूपोदय और कामप्रबोद्ध नामक ग्रंथों की रचना की।

10. महाराजा स्वरूप सिंह-
✍ शासन काल- 1698-1700 ई.

11. महाराजा सुजानसिंह-
✍ शासन काल- 1700-1735 ई.

12. महाराजा जोरावरसिंह-
✍ शासन काल- 1736-1746 ई.

13. महाराजा गजसिंह-
✍ शासन काल- 1746-1787 ई.

14. महाराजा सूरतसिंह-
✍ शासन काल- 1787-1828 ई.
✍ सूरतसिंह ने 1818 ई. में अंग्रेजो के साथ सहायक संधि की।

15. महाराजा रत्नसिंह-
✍ शासन काल- 1828-1851 ई.

16. महाराजा सरदार सिंह-
✍ शासन काल- 1851-1872 ई.

17. महाराजा डूँगरसिंह-
✍ शासन काल- 1872-1887 ई.

18. महाराजा गंगासिंह-
✍ शासन काल- 1887-1943 ई.
✍ गंगासिंह ने 1913 ई. में बीकानेर में प्रजा प्रतिनिधि सभा कि स्थापना की।
✍ गंगासिंह प्रथम विश्व युद्ध के बाद पेरिस शान्ति सम्मेलन में भाग लेने गये।
✍ गंगासिंह के प्रयासो से ही 1921 ई. में नरेन्द्र मण्डल का गठन किया गया।
✍ नरेन्द्र मण्डल का गठन किये जाने के कारण गंगासिंह को चैम्बर आॅफ प्रिंसेज कहा जाता है।
✍ गंगासिंह 1921-1925 ई. तक नरेन्द्र मण्डल के अध्यक्ष रहे थे।
✍ गंगासिंह ने तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930,1931,1932) में भाग लिया था।
✍ 1927 ई. में गंगासिंह ने गंगनहर का निर्माण करवाया था।
✍ छप्पनीया अकाल के समय गंगासिंह बीकानेर के शासक थे।
✍ दूसरे विश्व युद्ध में गंगासिंह ने अपनी ऊँटों कि सेना भेजी जिसे गंगारिसाला कहा जाता है।
✍ महाराजा गंगासिंह को अाधुनिक भारत या राजपूताने का भागीरथ कहा जाता है।

19. महाराजा सार्दूल/सादुल सिंह-
✍ सार्दूल सिंह बीकानेर रियासत का अंतिम शासक था।
✍ आजादी के समय सार्दूल सिंह बीकानेर का शासक था।
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जैसलमेर का भाटी वंश

May 25, 2018
👉 जैसलमेर का भाटी वंश-
✍ संस्थापक- सरदार सिंह भाटी
✍ स्थापना वर्ष- 1285 ई.
✍ स्थान- भटनेर (वर्तमान हनुमानगढ़)
✍ सरदार भाटी के पुत्र मंगलराय को गजनी के शासक द्वारा पराजित होना पड़ा उसके बाद उसने अपनी राजधानी भटनेर को छोड़कर तनौट को अपनी राजधानी बनाया।
✍ लौद्रवा जैसलमेर के निकट है जौ जैन मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।
✍ 1155 ई. में भाटी राजा जैसल देव भाटी द्वारा जैसलमेर की नीव रखी गई।


✍ जैसलमेर के भाटी वंश कि राजधानियों का क्रम-
1. भटनेर
2. तनौट
3. लौदवा
4. जैसलमेर

✍ 1570 ई. में नागौर दरबार में जैसलमेर के हरराय भाटी ने भाग लिया था। तथा मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किये और मुगलों की अधिनता स्वीकार की।
✍ जैसलमेर के शासक मूलराज द्वारा 1818 ई. में अंग्रेजो के साथ सहायक संधि कि गई।
✍ आजादी के समय जैसलमेर का शासक जवाहर सिंह था।
✍ जवाहर सिंह के समय 3 अप्रेल 1946 को सागरमल को जिंदा जलाया गया था।
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हाड़ौती के चौहान

May 25, 2018
👉 हाड़ौती के चौहान (चौहान वंश)
✍ हाड़ौती में वर्तमान कोटा, बूंदी, बारा, झालावाड़ के क्षेत्र आते है।
✍ राजस्थान का दक्षिणी-पूर्वी भाग (कोटा, बूंदी, बारा, झालावाड़) हाड़ौती कहलाता है।
✍ पूर्व में हाड़ौती क्षेत्र बूंदी में ही आता था।
✍ महाभारत काल में यहाँ मत्स्य (मीणा) जाति निवास करती थी।
✍ बूंदी का यह नाम  यहाँ के शासक बूँदा मीणा के नाम पर पड़ा था।
✍ 1342 ई. में हाड़ा चौहान देवा ने मीणाओं को पराजित कर चौहान वंश का शासन स्थापित किया।



✍ राजस्थान में मराठों का सर्वप्रथम प्रवेश बूंदी में हुआ था।
✍ 1743 ई. में बूंदी के शासक बुद्ध सिंह की कच्छावा रानी अमरकंवरी ने अपने पुत्र उम्मेद सिंह के पक्ष में मराठा सरदार होल्कर व राणोजी सिंधिया को आमंत्रित किया।
✍ 1818 ई. में बूंदी के शासक विष्ण सिंह ने अंग्रेजो से सहायक संधि की।
✍ 1569 ई. में बूंदी के शासक सुरजन सिंह ने अकबर से संधि की।
✍ मुगल बादशाह फर्रुखशियर के समय बंदी नरेश बुद्ध सिंह द्वारा जयपुर के जयसिंह के खिलाफ नहीं जाने पर बूंदी का नाम फर्रुखाबाद रखा तथा शासन कोटा नरेश दिया।
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सिरोही के चौहान

May 24, 2018
👉 सिरोही के चौहान (चौहान वंश)-
✍ प्राचीन साहित्य में सिरोही को अर्बुद प्रदेश कहा गया है।
✍ कर्नल जैम्स टाॅड के अनुसार सिरोही का मूल नाम शिवपुरी था।
✍ मध्यकालीन भारत में सिरोही में परमारों का राज्य था जिसकी राजधानी चंद्रावती थी।




👉 लुम्बा-
✍ लुम्बा ने 1311 ई. में अाबु और चंद्रावती को परमारो से छीनकर अपनी स्वतंत्रता स्थापित की।
✍ लुम्बा के द्वारा 1311 ई. में चौहानों की देवड़ा शाखा की स्थापना की गई।
✍ लुम्बा को सिरोही के चौहानों का अादिपुरुष कहा जाता है।

👉 अखैराज देवड़ा प्रथम-
✍ उपनाम- उड़ना अखैराज (तेज गति से आक्रमण करने के कारण)
✍ अखैराज देवड़ा प्रथम ने 1527 ई. में हुए खानवा के युद्ध में महाराणा साँगा का साथ दिया।

👉 सिरोही-
✍ स्थापना- 1425 ई.
✍ संस्थापक- सहासमल
✍ सहासमल ने सिरोही को अपनी राजधानी बनायी।
✍ 1823 ई. में सिरोही के शासक शिवसिंह ने ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि की जो की अंग्रेजो (ईस्ट इंडिया कंपनी) की सहायक संधि स्वीकार करने वाली अंतिम रियासत सिरोही थी।
✍ सिरोही रियासत का राजस्थान में एकीकरण विलय दो चरणों में किया गया।
✍ 26 जनवरी 1950 को  आबु और देलवाड़ा को छोड़कर सिरोही को राजस्थान में मिलाया गया।
✍ 1 नवम्बर 1956 को आबु और देलवाड़ा को राजस्थान में शामिल कर राजस्थान का एकीकरण पुरा किया गया।
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